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2 Amazing Motivational Stories in Hindi

दोस्तों आज के इस पोस्ट में मैं आपके साथ दो बहुत ही बेहतरीन Hindi Motivational Stories शेयर कर रहा हूँ जो मुझे यकीन है की आपको जरूर पसंद आएंगी।

ज्ञान हमेशा झुककर हासिल किया जा सकता है | Hindi Kahani

एक शिष्य गुरु के पास आया। शिष्य पंडित था और गुरु से भी ज्यादा मशहूर था। सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे।

समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन के अंतिम क्षणों में उसने गुरु की तलाश शुरू की।

संयोग से गुरु मिल गए। वह उनकी शरण में पहुँचा।

गुरु ने पंडित की तरफ देखा और कहा, ‘तुम लिख लाओ कि तुम क्या-क्या जानते हो। तुम जो नहीं जानते हो, वह तुम्हें बता दूंगा।’

शिष्य को वापस आने में सालभर लग गया, क्योंकि उसे तो बहुत शास्त्र याद थे। वह सब लिखता ही रहा, लिखता ही रहा। लिखते-लिखते कई हजार पृष्ठ भर गए।

गुरु ने फिर कहा, ‘यह बहुत ज्यादा है। मैं बूढ़ा हो गया। मेरी मृत्यु करीब है। इतना न पढ़ सकूँगा। तुम इसे संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।’

पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए।इस बार केवल सौ पृष्ठ थे।

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गुरू ने कहा, मैं यह भी ज्यादा है। इसे और संक्षिप्त कर लाओ।

कुछ समय बाद शिष्य लौटा। एक ही पन्ने पर सार-सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरू बिल्कुल मरने के करीब थे।

गुरु ने कहा, ‘तुम्हारे लिए ही रूका हूँ। तुम्हें समझ कब आएगी? और संक्षिप्त कर लाओ।

शिष्य को इस बार समझ आया और वह भागा-भागा दूसरे कमरे से एक खाली कागज ले आया। गुरु के हाथ में खाली कागज दिया।

गुरु ने कहा, ‘अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा संबंध बना रहेगा।

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कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं, मैं अज्ञानी हूँ। जो ऐसे भाव रख सके गुरू के पास, वही शिष्य है।

कहानी का निष्कर्ष

गुरू तो ज्ञान-प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत है, उसे अज्ञानी बनकर ही हासिल किया जा सकता है। पंडित बनने से गुरू नहीं मिलते।

सत्याचरण का प्रभाव – Hindi Moral Kahani

बात उन दिनों की है जब एक दिन पाटली-पुत्र नगर में सम्राट अशोक गंगा नदी के किनारे टहल रहे थे। उनके साथ उनके मंत्रीगण, दरबारी व सैंकड़ों लोग भी थे।

नदी अपने पूरे चढ़ाव पर थी। पानी के प्रबल वेग को देखते हुए सम्राट ने पूछा- “क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस प्रबल गंगा का बहाव उल्टा कर सके?

यह सुनकर सब मौन हो गए। उस जनसमूह से कुछ दूरी पर बिंदुमति नामक बूढ़ी वेश्या खड़ी थी। वह सम्राट के पास आकर बोली- ‘महाराज, मैं आपके सत्य-कर्म की गुहार लगाकर यह कर सकती हूँ।

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सम्राट् ने उसे आज्ञा दे दी। उस वेश्या की गुहार से प्रबल गंगा ऊपर की ओर उल्टी दिशा में गर्जन करते हुए बहने लगी।

सम्राट् अशोक भौंचक्के रह गए। उन्होंने वेश्या से पूछा कि उसने यह अद्भुत कार्य कैसे किया।

वेश्या बोली – ‘महाराज. सच्चाई की शक्ति से मैंने गंगा को उल्टी तरफ बहा दिया। अविश्वास के साथ राजा ने पूछा, तुम एक साधारण सी वेश्या….तुम तो स्वाभाविक पापी हो!

बिंदुमति ने जवाब दिया- ‘दुराचारी, चरित्रहीन स्त्री होकर भी मेरे पास ‘सत्य कर्म की शक्ति है।

महाराज, जो भी मुझे रूपये देता-चाहे ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र रहा हो या किसी अन्य जाति का रहा हो, मैं उन सबके साथ एक जैसा व्यवहार करती थी। जो मुझे रूपये देते थे, उन सबकी एक समान सेवा करती थी।

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महाराज, यही ‘सत्य कर्म है जिसके द्वारा मैंने प्रबल गंगा को उल्टी दिशा में बहा दिया।

कहानी का निष्कर्ष

धर्म के प्रति सचाई मनुष्य को महान् शक्ति प्रदान करती है। यदि हम जीवनभर अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से निभाएं, तो इस तथ्य को साक्षी रखकर चमत्कार का सकते हैं

जैसा कि बिंदुमति वेश्या ने कर दिखाया।